वनवास सहर्ष चले ज़ाते हैं ।
त्रसकाय स्थावर ज़ीव को, करूणा बरसाते।
सुख-दुख को समता भाव से लेकर,
मुस्कान सदा बनाए रहें ज़ो,
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
राजपुत्र ने त्याग दिए राज्य के सारे सुख
रिश्तों के खातिर कांटो का पथ अपनाया।
भ्रात लख़न और संगिनी सिया संग़, ज़ो है वन को ज़ाते।
किंचित भी न विचलित कर पाया ज़िसे माता के वचनो का,
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
मेरा भाग्य लिखा लेखनी ने ऐसा, क़ह सब़को बहलातें।
छल क़िया कैंकई ने ज़िसको, माता अपनी बतलातें।
सत्य,धर्मं,मर्यांदा को निज़, प्राणो से बढ़कर रख़ते,
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
कानन-कानन भटकते घास-फ़ूस और कंद मूल फ़ल ख़ाते।
अपनी चरण धूलि से
पाषाण को ज़ो हैं नार ब़नाते।
वचन पर अडिग रहकर , बद्धता,आदर्शोंं का,अहं नहीं जो रख़ते,
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
अपने भ्राता भरत का निश्छल प्रेम देख, उनक़ो फ़िर समझ़ाते।
सीख सिखा कर आदेशित कर ,धर्मं का पाठ पढ़ाते। जीवन को जिसने मर्यादा में जिया , अपने क़ुल को श्रेष्ठ ब़नाया,
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
कहते हैं चौदह वर्ष का वनवास हुआ था राम को
नहीं ये गलत सुना है
वनवास तो उनका अब तक चला
जग को जीवन देने वाले , पड़े रहे पंडाल में
प्रभु ने स्वयं जान लिया
मनुष्य जन्म आसान नहीं।
ऐसे करूणानिधि हमारें, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते।
© किरण विमलेश जैन
No comments:
Post a Comment