Sunday, January 28, 2024

आ. वैदेही कोठारी

शीर्षक :- रामलला आए रे ! सुःख समृद्धि लाए रे
तुझमें 'राम', मुझमें 'राम' जहाँ देखो 'राम-ही-राम',
श्याम 'राम', 'सीता-राम', भगवा रंग है 'राम'!

जन्म पर कान में बोला पहला शब्द है 'राम',
जीवन के अंत समय में सबने बोला 'राम'!

मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र 'राम', सब चाहे पुत्र 'राम',
पति 'राम', भाई लक्ष्मण,भरत के प्यारे 'राम'!

जीवन को हर परिस्थिति में साधे ऐसा शब्द है 'राम',
सिर्फ दुःख में ही नहीं, सुःख में भी बोलो 'राम'!

हर रिश्ते को प्रेम से 'जीते' ऐसे चरित्र है 'राम',
जीवन के हर दुःख,संघर्ष में स्थिरता का सबक सिखाते है,'राम'!

'राम' मुद्दा नहीं, 'राम' राजनीति नहीं,
'राम' दिखावा नहीं, 'राम' ढकोसला नहीं,
हर ह्रदय को प्रेम से सराबोर करते है 'राम'!


दुःख की बात है, त्रेता में था चौदह वर्ष का वनवास, इस युग में भी पांच सौ वर्ष का वनवास बिताया तुमने 'राम'!

सुःख घड़ी आई रे!, आज खत्म हुआ वह वनवास रे!, अयोध्या में आए सुःख समृद्धि लाए, हमारे 'ललाराम' रे!

जीवन की चेतना है 'राम', जीवन का आधार है 'राम',
सत्य है 'राम', अहिंसा है 'राम', न्याय है 'राम', जीत है 'राम'!
जीवन जीने की कौशलता को सिखाता है 'राम'!

घर के आँगन में दीप जलाए, फुलझड़ी,पटाखे फोड़, एक बार फिर दीपोत्सव का उत्सव हर्ष उल्लास से मनवाया तुमने 'राम'!

'राम' से भी बड़ा 'राम' का नाम,
अब अंत हुआ अंधकार,!  
व्यक्ति के व्यवहार को करें साकार
'राम' नाम की महिमा अपरम्पार,!
'जय सियाराम'!!


नोट - यह रचना पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित है |

© वैदेही कोठारी 
स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखिका

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