हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।
हो राम राज अब सदा यहाँ, यही प्रार्थना करती हूँ।।
जागा है भाग्य अयोध्या का, इसकी साक्षी बनती हूँ।
हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।।
बेला थी वह त्रेता युग की, जब जन्म लिए थे रघुराई।
लल्ला की देख के पहली छवि, कौशल्या मन में हर्षाई।।
आँगन में थिरकें राम लला, यही कामना रखती हूँ।
हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।।
लौटे हैं राम अयोध्या में, धन्य भई नगरी सारी।
देखन को राम लाल प्यारे, उमर पड़े हैं नर-नारी।।
इक झलक मुझे भी मिल जाए, यही आस मैं रखती हूँ।
हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।।
शबरी के झूठे बेरों से, भेदभाव झुठलाया था।
केवट को गले लगा करके, समता भी सिखलाया था।।
फिर से मानवता सिखलाना, यही चाह मैं रखती हूँ।
हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।।
तिथि द्वादश पौष माह की जो, सदा याद की जाएगी।
कलयुग में त्रेता लौटा है, नव इतिहास रचाएगी।।
मर्यादित बने इनसान यहाँ, यही प्रार्थना करती हूँ।
हे राम! तुम्हारा अभिनंदन,शीश झुका कर करती हूँ।।
स्वरचित ✍️
संध्या गुप्ता
हेलीमंडी, पटौदी
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