फर्ज़ अपना निभाने चलीं जानकी।
अंक में भरके तम को सवेरा हुआ
है उषा, पर तिमिर क्यूं घनेरा हुआ,
शुभ घड़ी की प्रतीक्षा सभी को थी पर
काल से काल का ऐसा फेरा हुआ।
धर्म से आज बाज़ी लगी प्राण की;
फर्ज़ अपना निभाने चलीं जानकी।
हैं कृपासिंधु राघव हमारे प्रभू
मात सीता की छवि को निहारें प्रभू,
पंथ सोचें अगम और देखें सिया
मन ही मन में ये बातें विचारें प्रभू।
कैसे वैदेही वन में रहेंगी भला
है सुमन-सी सुकोमल कली जानकी;
फर्ज़ अपना निभाने चलीं जानकी।
राजसी वस्त्र का त्याग करके चलीं
मां सिया जोगिया वेश धर के चलीं,
है सजल नेत्र अधरों पे मुस्कान है
अश्रु आंखों में सबके वो भरके चलीं ।
आज कण-कण अवध का ये कहने लगा
धन्य हो मात वसुधा जनी जानकी;
फर्ज़ अपना निभाने चलीं जानकी ।
© नेहा मिश्रा
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